शादी का झूठा वादा और रेप का आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने 4 साल के रिश्ते वाले मामले में आरोपी को किया बरी | Shaileshbhai Govindbhai Makwana vs State of Maharashtra (2026)

Case Details

Case Name: Shaileshbhai Govindbhai Makwana vs State of Maharashtra & Another

Citation: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 2260 of 2026

Court: Supreme Court of India

Jurisdiction: Criminal Appellate Jurisdiction

Date of Judgment: 20 April 2026

Bench:

1. Justice K.V. Viswanathan
2. Justice Manmohan

Appellant (Appealkarta):
Shaileshbhai Govindbhai Makwana

Respondents (Prativadi):

1. State of MaharashtraImpugned Order Challenged:
Order dated 03.09.2025 passed by Bombay High Court, Aurangabad Bench in Criminal Application No. 2335 of 2025.

Trial Court Case:
RCC No. 328/2021
2. Original Complainant (नाम गोपनीय)

शादी का झूठा वादा और रेप का आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को क्यों किया बरी?

भारत में अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जहां किसी महिला द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि आरोपी ने शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया। ऐसे मामलों में IPC की धारा 376 (बलात्कार) के तहत कार्रवाई की जाती है।

लेकिन क्या हर टूटा हुआ शादी का वादा बलात्कार माना जाएगा?

इसी महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Shaileshbhai Govindbhai Makwana vs State of Maharashtra & Another (2026) मामले में दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दोनों वयस्क व्यक्ति लंबे समय तक स्वेच्छा से रिश्ते में रहे हों और बाद में संबंध टूट जाए, तो मात्र शादी न करने से उसे बलात्कार नहीं माना जा सकता।

केस का संक्षिप्त परिचय

मामला: Shaileshbhai Govindbhai Makwana बनाम State of Maharashtra एवं अन्य

निर्णय की तारीख: 20 अप्रैल 2026

पीठ:

न्यायमूर्ति K.V. विश्वनाथन

न्यायमूर्ति मनमोहन

मुख्य मुद्दा: क्या शादी का वादा करके बनाए गए शारीरिक संबंध बाद में शादी न होने पर रेप माने जाएंगे?

केस के तथ्य (Facts of the Case)

शिकायतकर्ता महिला की शादी वर्ष 1998 में हुई थी।

बाद में पति-पत्नी के बीच मतभेद हो गए और वर्ष 2012 से दोनों अलग रहने लगे।

हालांकि उस समय महिला का तलाक अंतिम रूप से नहीं हुआ था, फिर भी उसने दूसरी शादी के लिए एक matrimonial website पर अपना प्रोफाइल बनाया।

इसी वेबसाइट के माध्यम से उसकी मुलाकात आरोपी शैलेशभाई मकवाना से हुई।

दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई।

फोन कॉल, वीडियो कॉल और नियमित संपर्क के कारण दोनों करीब आ गए।

महिला का आरोप था कि आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया था।

उसने यह भी कहा कि आरोपी ने बताया था कि वह अपनी पहली पत्नी से तलाक लेने की प्रक्रिया में है।

दोनों के बीच कैसे बने संबंध?

महिला के अनुसार अक्टूबर 2017 में आरोपी उससे मिलने उसके घर आया।

वह कुछ दिन वहीं रुका।

इस दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने।

इसके बाद भी दोनों का संबंध लगातार चलता रहा।

दोनों कई बार मिले।

साथ में यात्राएं कीं।

होटलों में भी साथ रहे।

गुजरात के भुज और सूरत में भी दोनों ने कई दिन साथ बिताए।

रिकॉर्ड के अनुसार लगभग 4 वर्षों तक दोनों के बीच प्रेम संबंध और शारीरिक संबंध बने रहे।

महिला ने क्या आरोप लगाए?

महिला ने फरवरी 2021 में FIR दर्ज कराई।

उसका आरोप था कि:

आरोपी ने शादी का झूठा वादा किया।

उसी भरोसे पर उसने संबंध बनाए।

आरोपी ने बाद में शादी करने से इनकार कर दिया।

उसके साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध भी बनाए गए।

आरोपी ने उससे लगभग ₹2.5 लाख भी लिए।

इन आरोपों के आधार पर आरोपी के खिलाफ IPC की धारा:

376(2)(n)

377

506

के तहत मामला दर्ज किया गया।

आरोपी का पक्ष क्या था?

आरोपी ने कहा कि:

दोनों वयस्क थे।

दोनों पहले से विवाहित थे।

दोनों को एक-दूसरे की वैवाहिक स्थिति की जानकारी थी।

महिला ने स्वयं तलाक होने से पहले matrimonial website पर प्रोफाइल बनाया था।

दोनों लगभग 4 वर्षों तक सहमति से संबंध में रहे।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि महिला को धोखे में रखकर संबंध बनाए गए थे।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

आरोपी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में FIR और चार्जशीट रद्द करने की मांग की।

लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट का कहना था कि:

पहले भी आरोपी ऐसी याचिका दाखिल कर चुका था।

मामले में ट्रायल होना चाहिए।

इसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने किन बातों पर ध्यान दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का विस्तृत अध्ययन किया और कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर जोर दिया।

1. दोनों पहले से विवाहित थे

कोर्ट ने कहा कि दोनों को पता था कि वे पहले से विवाहित हैं।

ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि महिला को वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं थी।

2. महिला ने तलाक से पहले ही दूसरा रिश्ता तलाशना शुरू कर दिया था

महिला ने स्वयं matrimonial website पर प्रोफाइल बनाया था।

उस समय उसका तलाक अंतिम रूप से नहीं हुआ था।

यह तथ्य दर्शाता है कि वह स्वयं दूसरा विवाह करना चाहती थी।

3. चार वर्षों तक संबंध जारी रहे

कोर्ट ने पाया कि:

2017 से 2020 तक दोनों के संबंध बने रहे।

दोनों साथ घूमे।

होटलों में रुके।

नियमित रूप से मिले।

इससे स्पष्ट होता है कि संबंध केवल किसी एक झूठे वादे पर आधारित नहीं थे।

4. महिला ने तुरंत शिकायत नहीं की

महिला ने आरोप लगाया कि अक्टूबर 2017 में उसके साथ जबरन संबंध बनाए गए थे।

लेकिन उसने फरवरी 2021 तक कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई।

लगभग चार वर्षों तक वह आरोपी के साथ संबंध में बनी रही।

यह तथ्य भी कोर्ट के लिए महत्वपूर्ण रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कानूनी सिद्धांत बताया?

कोर्ट ने कहा कि हर टूटे हुए वादे को “झूठा वादा” नहीं माना जा सकता।

दो स्थितियों में अंतर समझना आवश्यक है:

1. False Promise (झूठा वादा)

यदि आरोपी शुरू से ही शादी करने का इरादा नहीं रखता था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए शादी का बहाना करता है, तो यह अपराध हो सकता है।

2. Breach of Promise (वादा पूरा न होना)

यदि वास्तव में शादी करने का इरादा था लेकिन बाद में परिस्थितियों के कारण शादी नहीं हो सकी, तो इसे रेप नहीं कहा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों स्थितियां अलग-अलग हैं।

कोर्ट ने पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें शामिल हैं:

Mahesh Damu Khare v. State of Maharashtra (2024)

Naim Ahamed v. State (NCT of Delhi)

इन फैसलों में भी यही सिद्धांत स्थापित किया गया था कि हर असफल प्रेम संबंध को बलात्कार का मामला नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

दोनों पक्ष वयस्क थे।

दोनों को एक-दूसरे की स्थिति की जानकारी थी।

लगभग 4 वर्षों तक स्वेच्छा से संबंध बने रहे।

रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला जिससे साबित हो कि आरोपी ने शुरू से ही धोखा देने की योजना बनाई थी।

इसलिए IPC धारा 376, 377 और 506 के आरोप प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होते।

कोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने:

✅

 हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

✅

 आरोपी के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द (Quash) कर दी।

✅

 RCC No. 328/2021 समाप्त कर दिया।

✅

 आरोपी को राहत प्रदान की।

इस फैसले से क्या कानूनी सिद्धांत निकलता है?

इस निर्णय से निम्न महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आते हैं:

महत्वपूर्ण बिंदु

✔

 हर टूटा हुआ शादी का वादा रेप नहीं होता।

✔

 झूठा वादा और वादा पूरा न कर पाना अलग बातें हैं।

✔

 लंबे समय तक सहमति से बने संबंधों को स्वतः बलात्कार नहीं माना जा सकता।

✔

 यह साबित करना आवश्यक है कि शुरुआत से ही आरोपी का इरादा धोखा देने का था।

✔

 केवल रिश्ता टूट जाने से IPC धारा 376 लागू नहीं हो जाती।

निष्कर्ष

Shaileshbhai Govindbhai Makwana vs State of Maharashtra (2026) का यह फैसला “Promise to Marry Cases” में एक महत्वपूर्ण मिसाल है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों की रक्षा करना है, न कि हर असफल प्रेम संबंध को बलात्कार के मुकदमे में बदल देना।

यदि दो वयस्क व्यक्ति अपनी इच्छा से लंबे समय तक संबंध में रहे हों और बाद में संबंध समाप्त हो जाए, तो केवल शादी न होने के आधार पर उसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता।

यह निर्णय सहमति (Consent), तथ्य संबंधी भ्रम (Misconception of Fact) और झूठे विवाह वादे (False Promise of Marriage) के बीच अंतर को स्पष्ट करता है तथा भविष्य के ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।

CTA (Article End)

क्या आपको लगता है कि हर शादी का टूटा वादा रेप माना जाना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

ऐसे ही सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों की आसान भाषा में जानकारी पाने के लिए Advocate Ajay Kushwaha को फॉलो करें।

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